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Sunday, 22 May 2016

अंतर्मन

Here are few words threaded together from my diary:

भागे थे किसी ओर, और लौटे थे वहीं,

जब ढूंड हे नही रहे थे कुछ तो कैसे मिलेगा कहीं|


कहा था मेरे अंतर्मन ने जो मेने सुना नही,

शायद अँधा था में कुछ यू की खुद हे खुद को दिखा नही|


तलाशता रहा में मुझ को मुझी में,

कभी बेसूध था में कभी था सुध में|


जो खुद से हे किए तहे मेने वादे कभी,

कुछ निभाए कुछ तोड़ दिए तहे तभी,

जब मुड़ना था कही ओर, घूमे तहे किसी ओर,

पता नही चल कब गयी रात कब गयी भोर|


फ़ैसले भी हमने कुछ ऐसे किए तहे,

जख्म किसी और ने नही, हमने हे खुद पर किए थे


ज़िंदगी की राहो में यू चल रहे तहे,

सुलझे तहे कही उलझ कहीं गये तहे|


लोग होते थे खुश कभी हमसे मिलने पर,

अब हम खुद हे थे नाराज़ खुद से आईना दिखने पर|

फलसफा ज़िंदगी का क्यू था समझ ना आया,

जो चीज़ें ना थी हमारे लिए उन्ही से था मॅन लगाया|


जीत की खुशी होती नही, हार का गम नही होता,

खुशी से थोड़ी दूर हैं रास्ते, इस बात का भी अब दुख नही होता|


मुश्किल ह समझना अंतर मॅन को, सोचो चाहे जितना भी,

तोड़ता ह दुनिया से और कमभक्त जोड़ देता ह कभी भी|

END

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